७२वें गणतंत्र पर लाल क़िले के अपमान की घटना से आक्रोशित कविता-
-डॉ. पुनीत द्विवेदी ‘दुबौलवी”

भारत का गणतंत्र अनोखा, हमने-सबने देखा है।
झूठा सा ये स्वाभिमान, सम्मान देश का बेचा है।

लाल क़िले की प्राचीरों का, क्यूँकर ऐसा हाल किया।
भारत मॉ के पुत्रों ने ही, माता को बदहाल किया ।

भारत का गणतंत्र दिवस तो राष्ट्र प्रेम सिखलाता है।
प्रायोजित खालिस्तानी अब इसकी साख मिटाता है।

शासन अपना और प्रशासन बेबस खड़ा निहार रहा।
बेटा भारत मॉ के सीने पर बरछी से मार रहा।

इतने सारे लोग कहॉ से आये किसने भेजा है।
चिंता का यह यक्ष प्रश्न है चितंन भी संजीदा है?

नहीं-नहीं यह ठीक नहीं है क्या किसान अपराधी है?
भारत मॉ की जय ना करने की कैसी आज़ादी है?

बहुरूपी बनकर किसान अस्मिता बेचने आये हैं।
भोले अन्नदाता किसान, यह छल समझ ना पाये हैं।

खाल ओढ़कर गीदड़-लोमड हैं सबको गुमराह किये।
दिल्ली की सरकार निकम्मी आह नहीं पर वाह किये।

संकट का यह समय देश का कोविड से संघर्ष रहा।
वैक्सीन भारत में निर्मित विश्व हमें था देख रहा।

गर्व और अभिमान देश पर जब करने की बारी थी।
आस्तीन के सॉपों ने भारत मॉ से ग़द्दारी की।

एक-एक को दंड मिले अस्मिता मिटी है भारत की।
विश्व पटल पर नाक कटी है मेरे प्यारे भारत की।

महाभियोग लगाकर इनको सूली पर लटका देना।
वीर-शहीदों की गाथाएँ सीने पर खुदवा देना ।

आसानी से नहीं मिली ये ख़ून भरी आज़ादी थी।
त्याग और बलिदान कई परिवारों की बर्बादी थी।

इसको व्यर्थ नहीं जाने देंगे, करनी तैयारी है।आतंको की बेल पल रही, खालिस्तानी क्यारी है।

जागो भारत देश हमें भारत को पुन: जगाना है।
ग़द्दारों की फ़ौज तनी उनकी औक़ात बताना है।

डॉ. पुनीत ‘दुबौलवी’
इंदौर।
मो० 9993456731

(टिप्पणी: यह मेरी स्वरचित कविता देश में अलख जगाने हित देश को समर्पित-)

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