मानसिक रूप से कितनी स्वतन्त्र और कितनी सुरक्षित महिलाएं:रक्षा शर्मा

“मानसिक रूप से कितनी स्वतन्त्र और कितनी सुरक्षित महिलाएं:आएशा की आत्महत्या तात्कालिक उदाहरण”

आज हम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने जा रहे हैं ।महिलाएं हर क्षेत्र में अग्रसर हैं, कई योजनाओं का भरपूर लाभ लेकर आसमा को छू रही है, मगर अब भी सामाजिक विचारधारा आसमां में उड़ते परों को काट रही है।

इस विषय का तात्कालिक उदाहरण गुजरात की बेटी आयशा बानो की आत्महत्या है यह घटना साबित करती है की महिलाओं के लिए जितनी स्वतंत्रता और सुरक्षा की योजनाएं बना दी जाए मगर सामाजिक विचारधारा के चलते क्या वह मानसिक रूप से स्वतंत्र और सुरक्षित है ?

सामाजिक पारिवारिक और कामकाजी मोर्चों पर एक साथ जूझ रही महिलाएं आज बड़ी संख्या में मानसिक तनाव का शिकार बन रही हैं। कभी अपराध बोध तो कभी असुरक्षा का भाव उन्हें घेरे रहता है भावनात्मक आधार पर परिवार और समाज की रीढ़ महिलाएं आज इन मानसिक व्याधियों का शिकार बन रही हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार हर 5 में से एक महिला और हर 12 में से एक पुरुष मानसिक व्याधि का शिकार हैं। मानसिक रोग आज के दौर में सभी वर्गों और हर उम्र के लोगों को अपनी चपेट में ले रहे हैं ,लेकिन महिलाएं तेजी से इनकी गिरफ्त में आ रही है ,क्योंकि वे आज भी अपनी परेशानियों को खुलकर नहीं कह पाती हैं।

असल में देखा जाए तो हमारा सामाजिक पारिवारिक ढांचा ही ऐसा है ,की बहुत सारी महिलाएं उलझनो से बाहर नहीं आ पाती।

महिलाओं पर भविष्य की पीढ़ी निर्भर है ,महिलाओं के तनाव व अवसाद का आने वाली पीढ़ी को खामियाजा भुगतना पड़ सकता है।

महिलाओं को मानसिक तौर पर दुरुस्त रखने के लिए घर और बाहर दोनों जगह सुरक्षित व सम्मानजनक माहौल की दरकार है। सहयोग भरा संग-साथ और संवेदनशील पारिवारिक व्यवस्था उनके लिए बड़ा सबल बन सकती है।

अति आवश्यक है कि, समाज को महिलाओं के प्रति अपना दृष्टिकोण और व्यवहार बदलने की जरूरत है।

भारत जिसे हम माता कहते नहीं थकते वहीं महिलाओं के हालात हर स्वरूप में गंभीर है उनका मानसिक और शारीरिक शोषण करना आम बात है ।शैक्षिक क्षेत्र हो या फिर सामाजिक, कागजी स्तर पर सब परफेक्ट हैं लेकिन वास्तविक सुधार का कोई साक्ष्य कम से कम वर्तमान हालातों में तो नहीं दिखाई दे रहा।

हम कब समझेंगे कि जिस समाज में महिलाओं को उचित मान-सम्मान नहीं मिलता है वह समाज गर्त की ओर जाता है। मनुस्मृति में उल्लिखित एक श्लोक यहाँ प्रासंगिक है-

“शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैता वर्धते तद्धि सर्वदा।।”

इस श्लोक का अर्थ यह है कि जिस कुल में स्त्रियाँ कष्ट भोगती हैं, वह कुल शीघ्र ही नष्ट हो जाता है और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती हैं, वह कुल सदैव फलता-फूलता और समृद्ध रहता है। आखिर हम कब इस बात को समझेंगें कि महिलाएँ हैं तो हम हैं, ये नहीं तो हम नहीं।

“रक्षारचित”
कवियत्री एवम लेखिका

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