कैरियर हो या कोविड’ सकारात्मकता ही जीतती है- डॉ. पुनीत द्विवेदी

सरल संवाद।वैसे तो आज के संदर्भ में दुनियॉ का सबसे निगेटिव शब्द बन गया है ‘पॉज़िटिव’ होना। जहॉ पॉज़िटिव होना सकारात्मकता का प्रतीक हुआ करता था; कोरोना महामारी ने पॉज़िटिव शब्द को नकारात्मकता का प्रतीक बना दिया है। लेकिन फिर भी मन से पॉज़िटिव रहकर वायरस की इस बीमारी से बचा जा करता है। करियर और कोरोना की बीमारी दोनों सकारात्मक एटीट्यूड से ठीक होते हैं। करियर के प्रति सजक व्यक्ति का एटीट्यूड हमेशा सकारात्मक रहता है। चेहरे के भाव सकारात्मक रहते हैं। आंतरिक सोच सकारात्मक रहती है। सब्जेक्ट नॉलेज पर पकड़ भी विषषवार सकारात्मक बनाती है। अत: सकारात्मकता अंतत: सर्वदा लाभकारी होती है।

प्रश्न उठता है सकारात्मक क्यों रहें? सकारात्मक होना बड़ा ही आसान है। सकारात्मकता गिरे हुये मनोबल को पुन: शक्ति एवं ऊर्जा प्रदान करती है और व्यक्ति विजय प्राप्त करता है। करियर की चिंता और कोरोना कहीं ना कहीं हमारी आत्म़शक्ति को क्षीण करने का प्रयास करते हैं। सही डायरेक्शन में प्रयास व सही इलाज लेने पर सफलता मिलती है। अर्थात् अपनी ओर से प्रयत्न करना, प्रयत्न करते रहना नितांत आवश्यक है। एक श्लोक में कहा गया है कि “प्रयत्नेन योग्या सुयोग्या भवंति” अर्थात् ‘प्रयत्न करने से योग्य व्यक्ति और सुयोग्य बनता है।’

कोरोना काल में अपनी शिक्षा पूर्ण करने वाले विद्यार्थियों को यह ध्यान रखना है कि इस महामारी काल में किस प्रकार हम अपनी योग्यता को और निखार सकते हैं। जैसे कि देखने में आ रहा है कि बड़े-बड़े कारपोरेट हाऊसेस, कंपनियों ऑनलाइन मोड में आ चुकी हैं। अर्थात् वर्क फ़्रॉम होम की अवधारण मूर्त रूप ले चुकी है। जहॉ वर्चुअली काम कर सक पाना संभव हैं, वहॉ योग्य वर्चुअल मैनपॉवर को रोज़गार मिल रहा है। यह समय बदलाव का है। नई व्यवस्था को सीखने-समझने का है।स्वयं को उस व्यवस्था को अनुरूप तैयार करने एवं सफल होने का ये समय है। अत: पूरे मनोयोग से नई व्यवस्था के अनुरूप अपनी योग्यता एवं कौशल विकास को महत्वपूर्ण भूमिका में रखना आवश्यक है एवं उक्त निहित पूर्ण तैयारी भी अपेक्षित है।

ठीक ऐसे ही कोरोना काल में पैनिक होना सबसे बड़ी समस्या के रूप में उभरी है। जिसके कारण पूरे विश्व में ‘पॉज़िटिव’ नकारात्मकता फैल रही है। वैश्विक बीमारी कोरोना को लेकर अनेक भ्रांतियों समाज में फैल गयी हैं। सोशल मीडिया में तरह-तरह के निराधार बातों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के कारण समाज में पैनिक क्रियेट किया जा रहा है। महामारी के इस काल में ‘शहरी-नक्सलवाद’ के हौसले भी बुलंद हैं। इस महामारी के काल में राजनीतिक दलों की आपसी नोंक-झोंक पीड़ितों की पीड़ा बढ़ाने के कारण बन रहे हैं। अर्थात् समाज में सकारात्मकता का अभाव देखने को मिल रहा है। विभिन्न राजनीतिक गुटों के बीच का आपसी वैमनस्य समाज के पतन का कारण बनता जा रहा है। आवश्यकता है एकजुट होकर सकारात्मक परिवेश के निर्माण की। जिसमें समाज के प्रत्येक वर्ग का सहयोग अपेक्षित है।

चिकित्सक का सकारात्मक स्वभाव मरीज़ के आत्मविश्वास को प्रबल करता है, परिवार जनों का सकारात्मक व्यवहार पीड़ित को शक्ति प्रदान करता है, आस-पास का सहयोगी परिवेश पीड़ित के मनोबल को बढ़ाता है, प्रशासन का कुशल प्रबंधन पीड़ित समाज में विश्वास बढ़ाता है, सकारात्मक चर्चायें, सकारात्मक प्रबंधन, टीम भाव, सहयोग की भावना, अनर्गल बयानबाज़ी एवं सूचनाओं पर प्रतिबंध, नकारात्मक समाचारों के प्रसारण पर रोक, सोशल मीडिया का विवेकपूर्वक सही उपयोग समाज में सकारात्मक परिवेश बनाने में सहायक हैं। विडंबना है और खेद भी कि संसाधनों की कमी से समूचा विश्व जूझ रहा है। आवश्यकता है समाज को एकजुट होकर इज़रायल देश की भॉति कोरोना से लड़ने की। विचारों की सकारात्मकता ही विजय की कुंजी सिद्ध होगी, चाहे समस्या करियर की हो या कोरोना की। चुनाव आपको करना है।

[लेखक डॉ.पुनीत कुमार द्विवेदी (शिक्षाविद) मॉडर्न ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूट्स, इंदौर में प्रोफ़ेसर एवं समूह निदेशक की भूमिका में कार्यरत हैं।]

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