महामारी के इस संकटकाल में प्रबल होती देश विरोधी ताक़तों से सावधान- डॉ. पुनीत द्विवेदी

सरल संवाद।हमारे लिये महत्वपूर्ण राष्ट्र होना चाहिये। संकटकाल में जिस प्रकार वाह्य विदेशी ताकतों के साथ-साथ आंतरिक कलहकारी शक्तियॉ आपदा को अवसर की समझ में सक्रिय हुयी हैं उससे देश की प्रतिरोधक क्षमता और कमजोर होगी। यह समय ऐसा है कि जब आपसी दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ‘राष्ट्रनीति’ पर काम करना चाहिये। वैश्विक महामारी कोरोना के दुष्प्रभाव को कम करने के लिये सकारात्मक ऊर्जा के साथ टीम वर्क पर ध्यान देना आवश्यक है। इसमें सरकार और विपक्ष दोनों का समान उत्तरदायित्व बनता है। आपदा प्रबंधन हित पक्ष-विपक्ष अन्य मोर्चों को एकसाथ एकजुट होकर राष्ट्र की संप्रभुता का संरक्षण करना होता है। जनता की रक्षा हित संसाधनों की उपलब्धता पर सभी दलों का समान ध्यान होना चाहिये। इज़रायल जैसे देशों का अद्भुत उदाहरण मिलता है , जहॉ कोरोना महामारी से देश की रक्षा करने के लिये सरकार और विपक्ष दोनों का एकजुट होकर निर्णय लेना, जिससे कि आज इज़रायल ‘मास्क फ़्री कंट्री’ के रूप में जाना जाने लगा है।

भारत केन्द्र और राज्य की राजनीति के साथ एक सशक्त लोकतंत्र के रूप में पूरे विश्व में जाना-पहचाना जाता है। इस महान संप्रभु राष्ट्र ने विश्व समुदाय को सदा प्रेरित किया है और आवश्यकता पड़ने पर पालन-पोषण भी किया है। परंतु वैश्विक नीतियों का प्रभाव या दुष्प्रभाव कहें या सशक्त नेतृत्व की कमी के कारण पूर्व के लगभग ७ दशकों तक भारत उपेक्षित रहा। वर्तमान नेतृत्व ने उपलब्ध संसाधनों के समुचित उपयोग, नई नवाचार की नीतियों, कुशल एवं प्रभावी सामरिक दृष्टिकोण एवं विदेश नीति के माध्यम से कम समय में देश को और अधिक सशक्त किया है। भारत के आधारभूत संरचना का चहुंमुखी विकास विगत ५-६ वर्षों में तेज़ी से बढ़ता हुआ दिखा है।नोटबंदी में विदेशी शत्रुओं के ख़ज़ाने ख़ाली किये हैं, तथाकथित NGOs पर कसी नकेल ने भारत में आतंकवादी गतिविधियों को प्रायोजित करने वाले स्रोतों को बंद किया है, धारा ३७०और नागरिकता क़ानून ने क्रमश: कश्मीर की समस्या का समाधान किया है एवं बांग्लादेशी घुसपैठ के मंसूबों पर पानी फेर दिया है, कश्मीर के विस्थापितों का एक लंबी प्रतीक्षा के पश्चात घर वापसी हुयी है,वहीं NRC ने ग़ैर भारतीय नागरिकों पर सिकंजा कसा है। यह भी देखा गया है कि पड़ोसी दुश्मन को भी समय-समय पर अब सबक़ सिखा ही दिया जाता है; कभी सर्जिकल अटैक से तो कभी डोकलाम के मुद्दे पर।

वास्तव में भारत अब पहले का वह दब्बू देश नहीं रहा जो किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर मात्र सहभागिता की दृष्टि से देखा जाता था जिसके मत, विचार और विषय का कोई महत्व नहीं होता था और ना ही कोई देश महत्व देना चाहता था। भारत मात्र एक मार्केट था जहॉ सबको व्यापार करना था और भारत को दबा कर रखना था। वर्तमान महामारी के प्रथम चरण में भारतीय केन्द्रीय सरकार के लॉकडाऊन का असर कोरोना पर भारत की एक बहुत बड़ी जीत के रूप में विश्व समुदाय ने माना था और भारत की वाहवाही हुयी थी। स्वास्थ्य संबंधी सुविधाओं की कमी भारत जैसे विकासशील देशों में प्राय: सामान्य बात है। परंतु , भारत की दूरदर्शिता कहें या नेतृत्व की कुशलता; लॉकडाऊन की अवधि में स्वास्थ्य संबंधी उन व्यवस्थाओं का विकास अत्यंत ही द्रुतगति हुआ; जिसके बारे में सोच सक पाना भी मुश्किल था। चाहें वो वेंटिलेटर्स का निर्माण हो या मॉस्क और सेनेटाईजर्स, दवाओं या पी.पी.ई किट्स। भारत ने पूरे आत्मविश्वास के साथ आत्मनिर्भर भारत की और कदम बढ़ाना प्रारंभ कर दिया था। चुनौतियाँ आती गईं, समाधान होते गये, भारत रूका नहीं चलता रहा, बढ़ता रहा। कोरोना रोकथाम संबंधी केन्द्र की नीतियों का सभी राज्यों ने पालन किया और जिसका परिणाम सकारात्मक रहा। हमें कम हानि हुयी।

किसी भी देश की रीढ़ उस देश की अर्थव्यवस्था होती है जो कृषि, उद्योग, व्यापार, वाणिज्य, सेवाओं आदि पर निर्भर करती है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रीय लॉकडाऊन अर्थव्यवस्था के लिये घातक सिद्ध होती, क्योंकि पिछली बार के नुक़सान की भरपाई अभी तक हुयी नहीं कि कोरोना महामारी का दूसरा विनाशक दौर आ पहुँचा।अब ज़िम्मेदारी राज्यों की थी। भारत ही क्या विश्व के सबसे ताकतवर देशों की भी अर्थव्यवस्था, चिकित्सा व्यवस्था, शासन- प्रशासनिक व्यवस्थाएं सब चरमरा गई हैं। ध्यान रहे यह एक वैश्विक महामारी है जो वैश्विक समस्या है। इसके निदान हेतु सबका सहयोग नितांत आवश्यक है। संकट की इस घड़ी में अपने नागरिकों एवं विश्व समुदाय की रक्षा के लिये भारतीय वैज्ञानिकों ने वैक्सीन पर शोध कर सबसे कम मूल्य में वैक्सीन बनाकर विश्व समुदाय को अर्पित किया।‘वसुधैव कुटुम्बकम’ हमारी विशेषता है। आज समूचा विश्व भारत की तरफ़ आशा भरी निगाहों से देख रहा है। सबको पता है भारत सेवक है और सेवा करेगा। क्योंकि सेवा हमारी संस्कृति है।

विडंबना है, देश की आंतरिक सुरक्षा जो कि ‘शहरी नक्सलवाद’ से प्रभावित है। संकट के इस काल में देश के साथ, देश के लिये खड़े होने की अपेक्षा कुछ देश विरोधी आंतरिक ताक़तें देश को कमजोर करने में लगीं हैं। चीन समर्थित वामपंथ इस समय देश में असुरक्षा एवं अस्थिरता का माहौल बनाने से नहीं चूक रहा। ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते हमारा ध्यान वर्तमान समय में देश-समाज और हमारे लोगों की सुरक्षा करने का है। इस समय एकजुट होकर सरकार- शासन- प्रशासन के साथ कंधे से कंधा मिलाकर जनसेवा करने का है।मानव सेवा ही माधव सेवा है। ध्यान रहे, हमें सरकार को कोसने के अन्य कई अवसर मिलेंगे अगर हम जीवित बचे रहे तो।

[ लेखक डॉ पुनीत कुमार द्विवेदी (शिक्षाविद्) मॉडर्न ग्रुप ऑफ़ इंस्टीट्यूट्स, इंदौर में प्रोफ़ेसर एवं समूह निदेशक की भूमिका में कार्यरत हैं]

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