ममता नही उनके “आधार” कार्ड जीते-गगन चौकसे(मोटिवेशनल स्पीकर)

सरल संवाद।बंगाल चुनाव फिर इस बात पर मुहर लगा रहा है कि जनता स्वयं के भाग्य का चुनाव करती है। जो “समझदार” थे वो अपना उल्लू सीधा करने में कामयाब रहे जो “उल्लू” थे वो मालदा हत्याकांड, नवरात्रि पूजन में रोक , हिंसा हत्या और उत्पाती गैंग से हार गए। सुभाषचंद्र बोस की भूमि रक्तरंजित हो चुकी थी। फिर भी सोया हुआ हिन्दू वोटर यदि करीब 10 प्रतिशत और एकजुट हो जाता तो परिणाम बदल सकते थे। जीत और हार के अपने मायने है । ममता की छांव में कल से ही उत्पात फिर शुरू हुआ और अब कम थमेगा ये भविष्य वाणी नही की जा सकती। रोहंगिया की सरपरस्त फ़िलहाल शबाब पर है और आज तो बंगाल की नवाब है।

बांग्लादेश में जश्न ही बड़ा प्रश्न :
बांग्लादेशी घुसपैठियों में नया संचार हो रहा है। वो अब जीत को अपनी जीत मान रहे है। रोहंगिया महफूज महसूस कर रहे है कल तोड़फोड़ एक बस झलक है आगे भी तो उनकी ललक है। कुल मिलाकर एकजुट हो गए थे जहाँ मुस्लिम सीट थी , जहां TMC थी परिणाम एक जैसा रहा ये इत्तेफाक नही था। पूर्वनिर्धारित, पूर्वनियोजित निर्णय था ।

ममता नही शुभेंदु जीत के “अधिकारी”

ममता अपने गढ़ में हारी। ये हार बड़ी है और ममता की ये शामत कयामत तक याद रहेगी। चुनाव वो नही उनके आधार कार्ड ही लड़े और जीते। क्या देश के प्रधानमंत्री को “पांचों वक्त” गाली और बददुआ देने वाली हठी , साम्प्रदायिक स्त्री किसी राज्य की आलाकमान हो सकती है। हिन्दू ने शोध नही किया। अब जो एक थे वो शक्ति प्रदर्शन करेंगे और जो बिखरे थे, अलग थे सोए थे वो इस उत्पात , अलगाव का “दर्शन” करेंगे। हमारी नीति ही हमारी नियति तय करती है। भाजपा को स्वयं का स्थानीय चेहरा खड़ा करना होगा। 3 से 300 गुना उनकी पार्टी ने तरक्की की है ।

गगन चौकसे : स्तम्भकार एवं मोटिवेशनल स्पीकर

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