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* * @package ThemeGrill * @subpackage ColorMag * @since ColorMag 1.0 */ // Exit if accessed directly. if ( ! defined( 'ABSPATH' ) ) { exit; } ?> राणा जी जैसा ना हुआ न होगा - सरल संवाद

राणा जी जैसा ना हुआ न होगा

राणा जी जैसा ना हुआ न होगा

✍️अरुणगोविंद सिंह राजपूत
अधिवक्ता उच्च न्यायालय, इंदौर

महाराणा प्रताप ने राजस्थान में राजपूतों की शान को एक ऐसी ऊंचाई दी थी जिसकी मिसाल पूरी दुनिया में नहीं मिलती है। मेवाड़ के राजा रहे महाराणा प्रताप ने जिंदगी में कभी किसी गुलामी स्वीकार नहीं की और ना ही उन्होंने कभी मुगलों के किसी भी तरह के प्रस्ताव को स्वीकार किया।

माहाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 मेवाड़ के कुंभलगढ़ में हुआ था। उदय सिंह द्वितीय और महारानी जयवंता बाई के सबसे बड़े बेटे महाराणा प्रताप के एक महावीर और युद्ध रणनीति कौशल में दक्ष थे। उन्होंने मेवाड़ की मुगलों के बार बार हुए हमलों से रक्षा की और अपने आन बान के लिए कभी समझौता नहीं किया। महाराणा प्रताप अपने दादा राणा सांगा के समान एक अच्छे योद्धा थे। उन्होंने एक प्रतिज्ञा की थी ‘वह जब तक चितौड़ वापस नहीं ले लेंगे तब तक से भूमि पर सोयेंगे, पत्तों पर भोजन करेंगे व अपनी मूछों पर ताव नहीं देंगे।’

महाराणा प्रताप की असली ताकत का अंदाजा लोगों को भी 18 जून 1576 के हल्दी घाटी के युद्ध में हुआ। उससे पहले अकबर ने महाराणा के पास छह प्रस्ताव भेजे लेकिन महाराणा ने अकबर की अधीनता में मेवाड़ का शासन स्वीकार नहीं किया। इसके बाद अकबर ने मानसिंह और असफ खान को महाराणा से युद्ध के लिए भेजा और साथ में एक विशाल सेना भेजी जो महाराणा की सेना से कई गुना ज्यादा थी। दोनों सेनाएं उदयपुर से 40 किलोमीटर दूर हल्दी घाटी में मिली थी।

हल्दीघाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप के पास महज 20 हजार सैनिक थे और अकबर के पास 85 हजार सैनिक थे। इसके बावजूद महाराणा प्रताप ने साहस के साथ जंग लड़ी और आजादी के लिए संघर्ष करते रहे। राजा महाराणा प्रताप के भाले का वजन कुल 81 किलो था, साथ ही उनके छाती का कवच 72 किलो का था। भाला, कवच, ढाल और दो तलवारों के साथ उनके अस्त्र और शस्त्रों का वजन 208 किलो था।

उन्होंने चावंड को अपनी राजधानी बनाया और राज्य में सुव्यवस्था स्थापित की। महाराणा प्रताप का नाम राजपूताने के इतिहास में सबसे अधिक सम्मानीय और गौरवान्वित हैं।

वह स्वदेशाभिमानी, स्वतंत्रता का पुजारी, रणकुशल, स्वार्थत्यागी, सच्चा वीर और उदार क्षत्रिय थे। आल्प्स पर्वत के समान अरावली में कोई भी ऐसी घाटी नहीं, जो प्रताप के किसी न किसी वीर कार्य, उज्ज्वल विजय या उससे अधिक किर्तियुक्त पराजय से पवित्र न हुई हो।

स्वाभिमान के धनी और स्वाधीनता के पुजारी राणा प्रताप ने आजीवन मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की थी। उन्होंने कभी भी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं किया था। बताया जाता हैं कि 19 जनवरी 1597 को चावंड में धनुष की डोर खीचते वक्त आंत में गम्भीर चोट लगने के कारण इनका देहांत हो गया था। जब प्रताप की मृत्यु का समाचार अकबर को मिला तो बताया जाता हैं कि वह फूट फूट कर रोया। स्वाभाविक हैं प्रताप जैसे वीर दुश्मन हर किसी के भाग्य में नही होते। साथ ही अकबर द्वारा प्रताप को अपने अधीन करने के सपने भी टूटने के कारण उसे बड़ी हताशा हुई।

साल बीते सदिया बीत गई मगर इतिहास की अमरगाथाओं में वो जीवित हैं मानव की क्या मजाल जो सदियों तक अपना नाम चलाए वो तो महामानव ही था, जिनका नाम भर समूचे भारत के सम्राट को रात भर सोने नहीं देता था। अकबर हर रात ये दुआ कर सोता कि कही सपने में वो नीले का सवार भाला लेकर न आ जाए, जिन्होंने अपने स्वाभिमान एवं धर्म की खातिर आजीवन मुगलों को भयभीत रखा।

समाज पर आई विपदा के लिए जिन्होंने अपना सर्वस्व समाज पर न्योछावर कर दिया ऐसे हमारे वीर शिरोमणि परम स्वाभिमान महाराणा प्रताप की जयंती पर शत शत नमन ।

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