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* * @package ThemeGrill * @subpackage ColorMag * @since ColorMag 1.0 */ // Exit if accessed directly. if ( ! defined( 'ABSPATH' ) ) { exit; } ?> स्वतंत्रता संग्राम में गणेशोत्सव की भूमिका में बालगंगाधर तिलक का योगदान : राहुल इंक़लाब - सरल संवाद

स्वतंत्रता संग्राम में गणेशोत्सव की भूमिका में बालगंगाधर तिलक का योगदान : राहुल इंक़लाब

ब्रिटिश शासन में भारतीय कोई भी त्योहार सार्वजनिक रूप से नहीं मना पाते थे। तब उस दौर में बाल गंगाधर तिलक सामने आए और उन्होंने ही पुणे से गणेश चतुर्थी सार्वजनिक तौर पर मनाना शुरू किया। सीएम ने बताया कि बाल गंगाधर तिलक का यह कार्य बाद में एक आंदोलन बन गया और गणेशोत्सव ने देश की आजादी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। गणेशोत्सव को सार्वजनिक रूप देते समय तिलक ने उसे केवल धार्मिक कर्मकांड तक ही सीमित नहीं रखा, बल्कि आजादी की लड़ाई, छूआछूत दूर करने और समाज को संगठित करने और आम आदमी का ज्ञानवर्धन करने का उसे जरिया बनाया और उसे एक आंदोलन का स्वरूप दिया। अंत में इस आंदोलन ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। जिस सार्वजनिक गणेशोत्सव को आजकल लोग इतनी धूमधाम से मनाते हैं, उस पब्लिक फंक्शन को शुरू करने में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक को काफी मुश्किलात और विरोध का सामना करना पड़ा था। हालांकि सन् 1894 में कांग्रेस के उदारवादी नेताओं के भारी विरोध की परवाह किए बिना दृढ़निश्चय कर चुके लोकमान्य तिलक ने इस गौरवशाली परंपरा की नींव रख ही दी। बाद में सावर्जनिक गणेशोत्सव स्वतंत्रता संग्राम में लोगों को एकजुट करने का जरिया बना। 1890 के दशक में स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान तिलक अक्सर चौपाटी पर समुद्र के किनारे जाकर बैठते थे और सोचते थे कि कैसे लोगों को एकजुट किया जाए। हालांकि कांग्रेस पर 1885 से 1905 पर वर्चस्व रखने वाला व्योमेशचंद्र बैनर्जी, सुरेंद्रनाथ बैनर्जी, दादाभाई नौरोजी, फिरोजशाह मेहता, गोपालकृष्ण गोखले, मदनमोहन मालवीय, मोतीलाल नेहरू, बदरुद्दीन तैयबजी और जी सुब्रमण्यम अय्यर जैसे नेताओं का उदारवादी खेमा नहीं चाहता था कि गरम दल के नेता तिलक सार्वजनिक गणेशोत्सव शुरू करें।दरअसल, उदारवादी धड़ा इसलिए भी सार्वजनिक गणेशोत्सव का विरोध कर रहा था, क्योंकि 1893 में मुंबई और पुणे में दंगे हुए थे। लिहाजा, किसी भी दूसरे कांग्रेसी ने तिलक का साथ नहीं दिया। लेकिन तिलक ने चिंता नहीं की। वह मानते थे कि लक्ष्य पाने के लिए जीवन के सिद्धांतों से कोई समझौता नहीं करना चाहिए।

बहरहाल, जब उदारवादियों की बात तिलक नहीं माने, तब कांग्रेस ने आशंका जताई कि गणेशोत्सव को सार्वजनिक करने से दंगे हो सकते हैं। यह दीगर बात है कि आयोजन के बाद हुए दंगे के लिए गणेशोत्सव को ही जिम्मेदार माना गया।

हालांकि उस समय तिलक का राष्ट्रीय स्तर पर साथ लाला लाजपत राय, बिपिनचंद्र पाल, अरविंदो घोष, राजनरायण बोस और अश्विनीकुमार दत्त ने दिया था। जो भी हो, तिलक इसके बाद तो अपने जमाने के सबसे ज्यादा प्रखर कांग्रेस नेता के रूप में लोकप्रिय हो गए।

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