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* * @package ThemeGrill * @subpackage ColorMag * @since ColorMag 1.0 */ // Exit if accessed directly. if ( ! defined( 'ABSPATH' ) ) { exit; } ?> इतिहास के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को देवशिल्पी यानी की देवताओं के वास्तुकार के रूप में पूजा जाता है - सरल संवाद

इतिहास के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को देवशिल्पी यानी की देवताओं के वास्तुकार के रूप में पूजा जाता है

भगवान विष्णु की नाभि- कमल से ब्रह्मा जी उपत्त्न हुए थे। उन्होंने सृष्टि की रचना की। उनके पुत्र धर्म के सातवें पुत्र थे भगवान विश्वककर्मा,उनको जन्म से ही वास्तुकला में महारत प्राप्त थी।

विश्वकर्मा पूजा को विश्वकर्मा दिवस या जयंती भी कहा जाता है। विश्वकर्मा जयंती को प्रतिवर्ष सितम्बर के महीने में उल्लास के साथ मनाया जाता है। यह दिन लगभग पुरे भारत में विधि के अनुसार मनाया जाता है।

इस दिन सबसे बड़े वास्तुकार भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है। इतिहास के अनुसार भगवान विश्वकर्मा को देवशिल्पी यानी की देवताओं के वास्तुकार के रूप में पूजा जाता है। त्रिलोका या त्रिपक्षीय उन्हें त्रिलोका या त्रिपक्षीय युग का भी निर्माता माना जाता है।

साथ ही विश्वकर्मा जी में अपने शक्ति से देवताओं के उड़ान रथ, महल और हथियार का भी निर्माण किया था। यहाँ तक की यह भी माना जाता है की इंद्र का महा अस्त्र जो ऋषि दधिची के हड्डियों से बना हुआ था वह भी वुश्वकर्मा भगवान द्वरा ही बनाया गया था।

न सिर्फ स्वर्ग बल्कि उन्हें इस पुरे सृष्टि का निर्माता माना जाता है। उन्होंने सत्य युग में सोने की लंका जहाँ असुर राज रावण रहा करता था, त्रेता युग में द्वारका शहर, जहाँ श्री कृष्ण थे, द्वापर युग में हस्तिनापुर शहर का निर्माण जो पांडवों और कौरवों का राज्य था सभी का निर्माता उनको माना जाता है।

हम सभी के जीवन में शिप्ल का अत्यधिक महत्व है। कोई भी घर, मकान, भवन, नवीन रचना का काम शिल्प के अंतर्गत ही आता है। कुशल शिल्प विद्द्या और ज्ञान से मनुष्य विशाल इमारते, पुल, वायुयान, रेल, सड़क पानी के जहाज, वाहन आदि बनाता है।

इसलिए हम सभी के जीवन में शिल्प विद्द्या का शुरू से महत्व रहा है। आधुनिक समय में इंजीनियर, मिस्त्री, वेल्डर, मकेनिक जैसे पेशेवर लोग शिल्प निर्माण का काम करते है।

इसलिए मनुष्य के जीवन में सदैव विश्वकर्मा पूजा का महत्व है। यदि मनुष्य के पास शिल्प ज्ञान न हो तो वह कोई भी भवन, इमारत नही बना पायेगा। इसलिए भगवान विश्वकर्मा को “वास्तुशास्त्र का देवता” भी कहा जाता है। इनको “प्रथम इंजीनियर”, “देवताओं का इंजीनियर” और “मशीन का देवता” भी कहा जाता है।

विष्णुपुराण में विश्वकर्मा को देवताओं का “देव बढ़ई” कहा गया है। यह पूजा करने से अनेक फायदे है। इससे व्यापार में तरक्की होती है। पूजा करने से मशीन खराब नही होती है। व्यापार में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि होती है। जिस व्यक्ति के पास 1 कारखाना होता है उसके पास अनेक कारखाने हो जाते है।
सभी देवताओ में भगवान विश्वकर्मा का महत्वपूर्ण स्थान है। इन्होने अनेक प्रसिद्ध भवनों और वस्तुओ की रचना की। रावण के लिए सोने की लंका बनाई तो स्वर्ग में इंद्र का सिंघासन आपने बनाया।

जब असुर देवताओं को सताने लगे तो इन्होने ऋषि दधीची की हड्डियों से इंद्र का वज्र बनाकर असुरो का नाश किया। रावण के अंत के बाद राम, लक्ष्मण, सीता व अन्य साथी पुष्पक विमान पर बैठकर अयोध्या नगरी लौटे थे।

पुष्पक विमान का निर्माण भी भगवान विश्वकर्मा ने किया था। कर्ण का कुंडल इन्होने ही बनाया था। इसके अतिरिक्त भगवान शिव का त्रिशूल, विष्णु का सुदर्शन चक्र, यमराज का कालदंड बनाया था।

पांड्वो के लिए शानदार इंद्रप्रस्थ नगरी का निर्माण किया जो कौरव चकित रह गये। हस्तिनापुर को भी इन्होने ही बनाया था। जगन्नाथ पूरी में “जगन्नाथ” मंदिर का निर्माण किया। इस तरह अनेक प्रसिद्ध भवनों का इन्होने निर्माण किया था।

अमर पेंढारकर
प्रदेश सह सोशल मीडिया प्रभारी
भाजपा अजा मोर्चा, मध्यप्रदेश

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