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* * @package ThemeGrill * @subpackage ColorMag * @since ColorMag 1.0 */ // Exit if accessed directly. if ( ! defined( 'ABSPATH' ) ) { exit; } ?> कांग्रेसी ऐसे अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारते हैं - सरल संवाद

कांग्रेसी ऐसे अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारते हैं

मध्यप्रदेश विधानसभा के 28 स्थानों के उप चुनाव के नतीजे उनके लिये अप्रत्याशित हैं, जो शेख चिल्ली की तरह सपने देखने के आदी हैं। खासकर मप्र के कांग्रेसी उसी नस्ल के हैं। उनका बड़बोलापन, विरोधी के प्रति मर्यादा,सम्मान की कमी, अतिवादी रवैया उन्हें हमेशा ले डूबता है। इस बार भी नहीं बच पाये। कहां हैं वे कांग्रेसी जो 28 में से 28 सीटें जीतने के दावे कर रहे थे? कहां हैं उन के नेता,जो 10 नवंबर के बाद बात करने या देख लेने का दम भरते थे? कहां हैं वे प्रचार प्रेमी, जो रात-दिन ट्वीटर,फेसबुक,सोशल मीडिया पर जुमलों की अतिवृष्टि करते रहते थे, जो पूरी तरह से ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ होती थीं। यह कहावत भी निश्चित ही कांग्रेसियों के लिये ही बनी है- औंधे मुंह गिरना। अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने में तो कांग्रेसी सिद्धहस्त हैं ही, यह उसने फिर दिखा दिया। उन्होंने जितने वार सिंधिया पर किये, वे पलट कर उनके पैर को ही जख्मी करते रहे, जिसका दर्द उन्हें अब महसूस होगा।
जैसा कि स्पष्ट है कि भाजपा 19 सीटें जीत रही है और कांग्रेस के हाथ आई हैं 9 सीटें। यूं ये 9 सीटें कम नहीं हैं। एक वक्त था जब उप चुनाव में कांग्रेस एक सीट नहीं जीत पाती थी। याने स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन मुश्किल यह है कि वह शेखचिल्लीपने के ख्वाब देखते हुए केवल सत्ता की चाहत रखती है। इन उप चुनाव के परिणाम ने उसे यह संदेश दिया है कि उसे अगले 5-10 वर्ष तक मजबूत विपक्ष की भूमिका के लिये खुद को तैयार करना चाहिये। 2018 के अपवाद को प्रदेश की जनता का स्थायी जनादेश न मानने में ही उसकी भलाई है।
इन चुनाव परिणामों ने अब काफी कुछ स्पष्ट कर दिया है। सबसे बड़ी बात तो यह कि पूरे समय प्रचारित किया गया कि जहां से सिंधिया समर्थकों को टिकट दिया गया, वहां भाजपा का पुराना,कर्मठ, समर्पित कार्यकर्ता, नेता काम नहीं करेगा और वे ज्यादातर सीटें हार जायेंगे। यह सिरे से गलत साबित हुआ । इस मामले में कांग्रेसी एक बार फिर बुरी तरह से चूके कि भाजपा का कार्यकर्ता विरोधी को सीधे फायदा नहीं पहुंचाता। उसके पीछे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का शिक्षण-प्रशिक्षण,संस्कार हैं, वे इतने उथले नहीं हैं। कांग्रेसी कार्यकर्ता जिस तरह से अपने ही व्यक्ति को निपटाते हैं, उसे लगता है भाजपाई भी वैसे ही पेश आयेंगे।
यूं सिंधिया के तीन समर्थक ऐसे हारे हैं जो अभी मंत्री थे, लेकिन यह स्वाभाविक राजनीतिक प्रक्रिया है। अब राजेंद्र शुक्ल जैसे वरिष्ठ और समर्पित नेताओं को मंत्रिमंडल मेें लिया जा सकेगा। कहा जा रहा था कि सिंधिया समर्थक प्रत्याशी बुरी तरह पराजित होंगे, वह ख्याल खाली चला गया। यह भी प्रचारित किया गया कि शिवराज सिंह चौहान मन से काम नहीं कर रहे हैं। जबकि पूरे प्रदेश ने देखा कि उन्होंने धुंआधार प्रचार किया और कोशिश की कि वे प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में एकाधिक बार जायें। कांग्रेस की सबसे बड़ी पराजय तो यह है कि उसने ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर गद्दारी बनाम वफादारी का नारा गूंजायमान किया और जनता से अपील की कि वह गद्दारों को सबक सिखाये, वह पूरी तरह बेअसरकारी रहा। याने इससे यह पता चला कि जनता की दिलचस्पी इसमें कतई नहीं थी कि सिंधिया ने कांग्रेस सरकार गिराकर कुछ गलत किया, बल्कि उसने तो इस बात पर मोहर लगाई कि कांग्रेस सरकार गिराना जरूरी व सही था।
ये उप चुनाव मर्यादाहीनता, निजी आरोप-प्रत्यारोप और मुद्दाविहीन रहे, जिसके लिये कांग्रेस ज्यादा दोषी है, क्योंकि विपक्ष में होने के नाते उसे इस बात का खास ध्यान रखना था कि वह भाजपा सरकार की खामियों को उजागर करे। अपने अल्प कार्यकाल की उपलब्धियां गिनायें और साथ में सिंधिया समर्थकों द्वारा की गई पाला बदली को भी मर्यादित तरीके से अनैतिक ठहराये। तब शायद इसका असर भी होता, लेकिन कांग्रेस ने सारा फोकस सिंधिया पर कर दिया, जिसका नतीजा यह हुआ कि वह यह देख-समझ ही नहीं पाई कि जनमत किस ओर जा रहा है। भाजपा ने एक तरह से कांग्रेस को खून के प्यासे उस हिंसक पशु की तरह ललचाया जो पिंजरे में कैद शिकार को पाने के लिये खुद पिंजरे में कैद हो जाता है और आसपास खुले में घूम रहे आसान शिकार पर ध्यान ही नहीं दे पाता है।
इन नतीजोंं ने कांग्रेस को मप्र की राजनीति में एक बार फिर काफी पीछे धकेल दिया है। उसके लिये 2023 की राह और भी मुश्किल हो गई है। उसे 2018 की बनिबस्त दुगनी ताकत से काम करना होगा। अभी तक निर्विवाद रहे कमलनाथ पर अंगुलिया उठेंगी, जो कांग्रेस में रस्साकसी ही बढ़ायेगी। अब वे नेता प्रतिपक्ष व प्रदेश अध्यक्ष जैसी दो नाव की सवारी शायद ही कर पायें। उनकी उम्र के मद्देनजर 2023 के चुनाव का नेतृत्व तो वे नहीं कर पायेंगे। ऐसे में नये नेतृत्व की तलाश भी कांग्रेस में तकरार ही बढ़ायेगी। इस समय जितने भी नाम हैं, यथा दिग्विजय सिंह,कमलनाथ, सुरेश पचौरी,अरूण यादव,अजय सिंह,कांतिलाल भूरिया में से 2023 में कुछ उम्र दराज हो चुके होंगे तो कुछ अस्वीकार्य। तब बड़ा संकट यही होगा कि क्या जीतू पटवारी जैसे बचकाना व्यवहार वाले नेताओं को आगे किया जायेगा या प्रियव्रत सिंह, दिग्गी पुत्र जयवर्धन सिंह, कमलनाथ पुत्र नकुलनाथ या आदिवासी के नाम पर उमंग सिंघार या भूरिया के बेटे विक्रांत को आगे लाया जायेगा? यदि ऐसा हुआ भी तो क्या ये लोग भाजपा जैसी कार्यकर्ता आधारित, संघ दीक्षित, मजबूत जनाधार वाली पार्टी से लोहा लेने का माद्दा जुटा पायेंगे?
इन उप चुनाव के परिणामों ने एक बात बेहद साफ कर दी है कि जनता किसी भ्रामक प्रचार से विचलित नहीं होती। वह निजी लड़ाई को भी ठीक नहीं मानती। दलबदल भी उसके लिये मुद्दा नहीं है। वह देखती है नेतृत्व की सौम्य व लोकप्रिय छवि, जातिगत समीकरण,जीतने की संभावना, लंबी राजनीतिक पारी खेलने वाला दल और साथ में यह भी कि उसके भले के लिये किसके पास क्या मुद्दे हैं। उसके इन पैमानों पर निश्चित ही भाजपा खरी उतरी है और कांग्रेस को खारिज किया है। इसलिये बेहतर तो यह होगा कि कांग्रेस यदि मध्यप्रदेश में अपनी जमीन को फिर से मजबूती देना चाहती है तो उसे जनता के मन में कर्मठता,सौम्यता,निजी मसलों से दूरी और वास्तविक मायनों में जन कल्याणकारी योजनाओं की प्रस्तुति करनी होगी। केवल राजनीतिक बयानबाजी, ट्वीटर,फेसबुक,सोशल मीडिया पर आरोपों की बौछार से वह प्रभावित तो नहीं होती,उलटे आपको उलटा कर देने में जरूर जुट जाती है।

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